हरियाणा सरकार के लिए गले की फांस बना हुआ है किसान आंदोलन, कई चुनौतियों से जूझ रही BJP-JJP

कृषि कानून के विरोध में किसान नेताओं द्वारा आंदोलन जारी रखने के फैसले ने हरियाणा सरकार की मुसीबतें बढ़ा दी हैं. प्रदेश के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला पिछले दो दिनों से नई दिल्ली में व्यस्त दिखे. कारण था, गठबंधन सरकार के ऊपर बढ़ता दबाव.

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सभी को उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप और विवादित कृषि कानूनों पर रोक लगा देने के बाद शायद आंदोलनकारी किसान वापस अपने घर रवाना हो जाएंगे. लेकिन अब ऐसा होता दिख नहीं रहा है.

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किसान नेताओं ने साफ कर दिया है कि वह सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित चार सदस्यों वाली कमिटी का बहिष्कार करेंगे और जब तक कृषि कानूनों को पूर्णत: वापस नहीं ले लिया जाता, उनका प्रदर्शन जारी रहेगा.

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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को साफ कह दिया था कि अगर किसान फिर भी आंदोलन जारी रखना चाहते हैं तो वह उन्हें रोकेगी नहीं.

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इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही माना जाना चाहिए के देश के सबसे बड़े अदालत का हस्तक्षेप और फैसला भी किसान नेताओं को मंजूर नहीं है, जिसका देश पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है.

सुप्रीम कोर्ट से बड़ी कोई संस्था है नहीं जो किसी भी कानून की जांच करे और उसे गैर-संविधानिक करार देते हुए रद्द भी कर सके. चूंकि अब मामला सुप्रीम कोर्ट के पास है,

प्रतीत होता है कि कृषि कानून के विरोधी देश के सबसे बड़े न्यायालय पर दबाब डाल कर अपने हक में फैसला करवाना चाहते हैं.

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल, जो अभी भारतीय जनता पार्टी की मुसीबतों पर जश्न मना रहे हैं और आंदोलन को बढ़ावा दे रहे हैं,

उन्हें याद रखना चाहिए कि भविष्य में जब भी उनकी सरकार बनेगी तो उन्हें भी ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है. राजनीतिक विरोध और लड़ाई को तो समझा जा सकता है,

लेकिन सुप्रीम कोर्ट जैसी संवैधानिक संस्था के खिलाफ जाना भविष्य के लिए एक गलत परंपरा की शुरुआत हो सकती है.

इस में कोई शक की गुंजाइश नहीं है कि लगातार दो बार चुनाव में ध्वस्त होने के बाद कांग्रेस पार्टी किसानों के जरिये केंद्र में बीजेपी की सरकार को गिराने की मंशा रखती है.

एक सवाल अब यह भी है कि जब केंद्र सरकार आंदोलनकारियों के निशाने पर है तो इसमें हरियाणा सरकार की मुसीबतें कैसे बढ़ गई हैं?

हरियाणा देश के सबसे प्रमुख कृषि उत्पादक प्रदेशों में है. राज्य के लगभग 65 फीसदी नागरिक ग्रामीण इलाकों में रहते हैं और उनमें से अधिकतर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर अपनी जीविका के लिए कृषि क्षेत्र पर ही निर्भर हैं.

दूसरी बात, हरियाणा में बीजेपी-जेजेपी गठबंधन की सरकार है. जहां बीजेपी का प्रभाव क्षेत्र शहरी इलाकों में माना जाता है, वहीं जेजेपी मूलत: ग्रामीण और किसानों की पार्टी है.

जेजेपी का संबंध किसान नेता चौधरी देवीलाल के परिवार से है. इंडियन नेशनल लोकदल में विभाजन के बाद देवीलाल का परिवार दो हिस्सों में बंट चुका है.

जहां ओमप्रकाश चौटाला और अभय सिंह चौटाला INLD में हैं, वहीं अजय सिंह चौटाला और उनके दो पुत्र दुष्यंत और दिग्विजय ने अपनी अलग पार्टी जेजेपी का गठन किया.

अब INLD हो या जेजेपी, दोनों देवीलाल के ग्रामीण और किसानों के बचे हुए वोट बैंक की लडाई लड़ रहे हैं. जेजेपी अभी तक इस लडाई में आगे दिख रही थी. 2019 के विधानसभा चुनाव में जेजेपी को 10 सीटों पर सफलता मिली थी और INLD को सिर्फ एक सीट पर.

INLD के एकलौते विधायक अभय सिंह चौटाला ने विधानसभा से अपना कंडीशनल त्यागपत्र विधानसभा स्पीकर को भेज दिया है, यह कह कर, कि अगर 26 जनवरी तक किसान आंदोलन का हल नहीं निकला तो 27 जनवरी को उनका इस्तीफा मंजूर कर लिया जाए. अब लगता नहीं है कि किसान आंदोलन का जल्द ही कोई समाधान निकलने वाला है.

अभय चौटाला ने जो पहल की है, उससे अन्य दलों के विधायकों पर दबाव बढ़ गया है, खास कर ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र से चुने विधायकों पर.

जेजेपी के चार विधायक पार्टी पर दबाब बना रहे हैं कि या तो किसान आंदोलन का कोई समाधान निकल कर आए या तो फिर पार्टी सरकार से अलग हो जाए.

मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर और उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला ने स्पष्ट किया है कि किसान आंदोलन से सरकार को कोई खतरा नहीं है और सरकार पूरे पांच साल तक चलेगी.

शायद उनका कहना सही भी हो. बीजेपी के भी कुछ विधायक किसानों के पक्ष में हैं, पर बीजेपी से बगावत करने का मतलब है कि उन्हें विधायक पद से हाथ धोना पड़ेगा.

कानूनी तौर से विभाजन के लिए दो तिहाई विधायकों का एक साथ होना जरूरी है. यानी अगर बीजेपी के 27 विधायक पार्टी से एक साथ बगावत करे तब ही वह विधायक बने रहेंगे. इस लिहाज से जेजेपी की स्थिति थोड़ी डमाडौल हो सकती है. पार्टी को तोड़ने के लिए सात विधायकों की जरुरत होगी.

इतना तो तय है कि जेजेपी के 10 में से तीन विधायक सरकार के साथ रहेंगे. खुद दुष्यंत चौटाला, उनकी मां नैना चौटाला और जेजेपी कोटे से मंत्री अनूप धानक.

चार निर्दलीय विधायक, हरियाणा लोकहित पार्टी के संस्थापक और इकलौते विधायक गोपाल कंडा भी सरकार के साथ ही रहेंगे. यानी सरकार के पक्ष में कम से कम 47 विधायक निश्चित हैं. हरियाणा विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या 90 है.

चाहे बीजेपी हो या जेजेपी, हरियाणा में दोनों दल ऐसी स्थिति से बचना चाहेंगे. पर इतना तो तय है कि अगर किसान आंदोलन का सबसे अधिक कहीं प्रभाव पड़ेगा तो वह हरियाणा ही होगा.

एक तरफ केंद्र सरकार द्वारा कृषि कानूनों को किसी भी हाल में वापस नहीं लिए जाने का फैसला और दूसरी तरफ किसान नेताओं का हठ कि इससे कुछ भी कम उन्हें मंजूर नहीं है.

दोनों स्थितियों ने अजीब हालात पैदा कर दिए हैं. सुप्रीम कोर्ट ही एक सहारा था पर उस पर भी दबाव डालने की राजनीति हो रही है, जो दुर्भाग्यपूर्ण, दुखद और निंदनीय है.

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